पूर्व महापौर ज्योति खंडेलवाल को हाईकोर्ट से क्लीनचिट

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जयपुर। जयपुर नगर निगम की पूर्व महापौर ज्योति खंडेलवाल एवं उनके पति शरद खंडेलवाल के खिलाफ दर्ज कराई गई एक शिकायत पर उन्हें हाईकोर्ट में क्लीनचिट मिल गई है। उनके खिलाफ हाईकोर्ट में शिकायत करने वाले शिकायतकर्ता को सुनवाई के बाद कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश अजीत सिंह न्यायाधीश अनुपिन्दर सिंह ग्रेवाल ने खारिज कर दिया।

गौरतलब है कि करीब एक वर्ष पूर्व शिकायतकर्ता सूरजमल ने हाईकोर्ट में पूर्व महापौर ज्योति खण्डेलवाल व उनके पति के खिलाफ पत्र लिखकर शिकायत की थी कि महापौर ज्योति खण्डेलवाल ने पद का दुरूपयोग करते हुए भ्रष्टाचार किया।

पूर्व महापौर ज्योति खण्डेलवाल व उनके पति शरद खण्डेलवाल ने पत्र मे लगाये गये आरोपों को झूठे एवं बेबूनियाद बताते हुए पेरावाईज जवाब दिया। साथ ही उन्होंने कोर्ट को बताया की महापौर पद पर रहते हुए मैनें जयपुर शहर को वल्र्ड क्लास सिटी बनाने के लिए भरसक प्रयत्न किये साथ ही नगर निगम में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई, जिसके परिणामस्वरूप भ्रष्ट अधिकारियों को जेल की हवा खानी पडी।

उन्होंने अपने कार्यकाल में जयपुर शहर की सफाई व्यवस्था को दुरस्त करने के लिए एवं अवैध निर्माणों को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाये। यह शिकायत राजनीति से प्रेरित है। पूर्व में भी इस शिकायत में उल्लेखित बिन्दुओं की जांच पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा निदेशक, स्थानीय निधि अंकेक्षक द्वारा भी करवाई जा चुकी है, जिसमें सभी आरोपों को गलत बताते हुए पूर्व महापौर को क्लीनचीट मिली थी।

साथ ही भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने भी शिकायत की जांच के पश्चात शिकायत को नस्तीबद्व कर दिया था। इसलिए इसकी तह तक जाना चाहिए ताकि शिकायतकर्ता की भावना एवं इसके पीछे छिपी राजनीति का पर्दाफाश हो सके।

न्यायालय ने नगर निगम के अधिवक्ता से भी शिकायतकर्ता द्वारा की गई शिकायत का पैरावाईज जवाब मांगा। नगर निगम ने भी न्यायालय में जवाब पेश करते हुए कहा कि पूर्व महापौर ज्योति खण्डेलवाल पर लगाये गये आरोप बेबुनियाद है।

न्यायालय  ने आलोचना करते हुए अपने आदेश में कहा कि शिकायतकर्ता के द्वारा की गई शिकायत जनहित याचिका के लायक ही नहीं है, क्योकि यह शिकायत बिना शपथ-पत्र के एक जज को लिखी गई है। शिकायतकर्ता स्वयं या उसकी ओर से कोई अधिवक्ता इस मामले की पैरवी के लिए कभी भी न्यायालय नहीं आये हैं। इसलिए आदेश में विभिन्न मामलो में न्यायालय द्वारा दिये गये आदेशों का हवाला देते हुए इस लेटर पीटीशन को खारिज कर किया गया।

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