महज घोषणा ही रह गई स्लम फ्री सिटी की कवायद

जयपुर। राजधानी जयपुर सहित तीन शहरों को स्लम सिटी बनाने की योजना विधानसभा चुनावों के मद्देनजर आचार संहिता लागु होने के बाद अधर में लटकी ग...

जयपुर। राजधानी जयपुर सहित तीन शहरों को स्लम सिटी बनाने की योजना विधानसभा चुनावों के मद्देनजर आचार संहिता लागु होने के बाद अधर में लटकी गई है। राजधानी को स्लम सिटी बनाने के लिए प्रयास जरूर हुए लेकिन अपने मुकम्मिल अंजाम तक नहीं पहुच पाए। इस कारण करीब आधा दर्जन योजनाओं पर काम शुरू होने की बजाए अब खटाई में पड़ा है। वहीं अजमेर, जोधपुर, कोटा सहित दूसरे शहरों में भी कार्य शुरू नहीं हो पायाहै।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केन्द्रीय संस्थाओं की सहयोग राशि से स्लम सिटी प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने की योजना बनाई थी लेकिन शहरी विभाग इन योजनाओं को सही समय पर अमली-जामा पहना नहीं सके। गौरतलब है कि राज्य के प्रमुख शहरों को स्लम फ्री सिटी बनाने के लिए केन्द्रीय शहरी आवास विकास मंत्री गिरिजा व्यास कह चुकी है और इसके तहत केन्द्र की कई योजनाएं शहरों में चल रही है। इसमें राजीव गांधी आवास योजना, बीपीएल शहरी आवास योजना, गरीब रेखा से नीचे जीवन यापान करने वालों के लिए मुख्यमंत्री की तरफ से संचालित अन्य आवासीय योजनाएं मौजदू है।

राजधानी के मुहाना मंडी स्थित कीरो का ढाणी प्रोजेक्ट, संजय बाजार भट्टा बस्ती कच्ची बस्ती पुनर्वास योजना, द्वारकापुरी आवासीय योजना, प्रताप नगर, अर्फोडेबल आवासीय योजनाओं के तहत सस्ते आवासों के साथ अन्य योजनाएं है। लेकिन इसके बाद भी इनमें से एक भी योजना पूरी नहीं हो पाई है।

द्वारकापुरी आवासीय योजना तो शुरू होने के बाद से विवादों में घिरी रही। अब हालत यह है कि यह पर आवासों का निर्माण कार्य अटका हुआ है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री पांच लाख आवासों के निर्माण की घोषणा की थी लेकिन इतनी बड़ी संख्या में सस्ते आवासों की कवायद पूरी नहीं हो सकी है। कुछ योजनाओं को छोड़ दे तो अन्य योजनाओं पर कार्य शुरू नहीं हो पाया है जोधपुर में राजीव गांधी आवास योजना के  लंबे समय तक टेण्डर तक नहीं हो पाए और अब आचार संहिता के कारण काम अटक गया है।

राजधानी में कीरो की ढाणी, मुहाना रोड पर आवासों का ढ़ाचा खड़ा हो गया है लेकिन आगे का काम अटका हुआ है। द्वारकापुरी में आने वाले सस्ते आवासों की श्रंखला अटक गई है, फेज 1 का काम आधा अधूरा है तो फेज-2 शुरू होना मुश्किल दिख रहा है। यहीं हाल जेडीए की अर्फोडेबल आवासीय योजनाओं को होता दिखाई दे रहा है। यहीं नहीं राजधानी की आधी से ज्यादा कच्ची बस्तियों का अब तक सर्वें तक नहीं हो पाया है।

निगम, जेडीए और अन्य शहरी विकास की संस्थाओं के पास इस बात का रिकार्ड नहीं है कितने लोगों को आवास दिए जाने है। हालत यह है कि सर्वेधारियों का सही रिकार्ड नहीं होने के कारण इनको आवास मिल पाना मुश्किल है। शहर में हर वर्ष कच्ची बस्तियों में रहने वालों लोगों की संख्या में इजाफा हो रहा है। शहरी संस्थाओं के पास इन लोगों के पुख्ता रिकार्ड नहीं होने के कारण कच्ची बस्तियों को बसने से रोक पाना भी मुश्किल हो गया है।

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