दीपावली नहीं, यहां खेली जाएगी आज 'अंगारों की होली'

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केकड़ी (अजमेर)। देशभर में जहां पिछले दो दिनों से दीपोत्सव कहे जाने वाले पर्व दीपावली की धूम मची है और लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं व बधाइयां दे रहे हैं, वहीं एक जगह ऐसी भी है जहां आज गोवर्धन पूजा के अवसर पर दीपावली नहीं, बल्कि होली खेली जाएगी, वो भी साधारण नहीं अपितु अंगारों की होली। जी हां, सुनने में आपको भले ही थोड़ा अजीब लग रहा होगा , लेकिन ये सच है। और ये सच भी पिछले कई सालों से लगातार एक परंपरा के रूप में निभाया जा रहा है, वो भी पूरी शिद्दत के साथ।

दरअसल, राजस्थान में अजमेर जिले के केकड़ी कस्बे में ये अनूठी परंपरा निभाई जाती है, जहां दीपावली के दूसरे दिन यानि गोवर्धन पूजा के बाद से शुरू होने वाला ये अंगारों का युद्ध देर रात तक चलता रहता है। इस दौरान कई लोग एक-दूसरे पर अंगारे बरसाते रहते हैं, जिसमें कई लोग बुरी तरह से झुलस भी जाते हैं। हालांकि हालात को काबू में रखने के लिए पुलिस-प्रशासन का पूरा का पूरा अमला भी इस पर नजर बनाए रखने के लिए साथ में होता है, लेकिन कई शरारती तत्व इनको भी नहीं बख्शते और कई पुलिस वाले भी इन अंगारों की चपेट में आकर घायल हो जाते हैं। इस लिहाज से आसपास के कई क्षेत्रों से अतिरिक्त पुलिस जाप्ता भी बुलाया जाता है और कुछ प्रशासनिक अधिकारी सिविल ड्रेस में भी होते हैं, जिससे काफी हद तक शरारती तत्वों पर नजर रखने में कामयाबी मिलती है।

दरअसल, गोवर्धन पूजा वाले दिन बेलों का पूजन राजस्थान मे अजमेर जिले के उपखंड केकड़ी में बड़े ही अनूठे तरीके से किया जाता है, जिसमें खेतों में किसानों के साथी माने जाने वाले वाहन ट्रेक्टर और बेलों का पूजन किया जाता है। पूजा होने के बाद जहां ट्रेक्टर को फूलों और मालाओं से सजाया जाता है, वहीं बेलों के भी रंग-बिरंगे छापे लगाकर सजाया जाता है। इसके बाद बेल पालने वाले किसान अपने-अपने बेलों को पूरे शहर के निमित किये जाने वाले कार्य के लिए लेकर जाते हैं। पूरे शहर को अपना परिवार मानकर किए जाने वाला यह पुनित कार्य ही सबसे अनूठी परंपरा है, जिसे 'घासभैरूं' के नाम से जाना जाता है।

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इस परंपरा में भैरूंजी के रूप में पूजे जाने वाले एक बड़े से शिलाखंड़ को पूरे शहर में घुमाया जाता है, ताकि शहर के किसी घर में किसी भी तरह की कोई आपदा-विपदा हो तो भैरूंजी उसे समाप्त कर अपने साथ ही ले जाते हैं और शहर को तमाम विपदाओं से बचाया जा सके। इस परंपरा में सबसे अचरज वाली बात यह है कि भैरूंजी के इस शिलाखंड की इस तरह से साल में सिर्फ इसी दिन पूजा जाता है और इस दिन के अलावा अगर कोई तीन-चार बलिष्ठ आदमी इसे उठाने का प्रयास करे तो वे इसे उठा सकते हैं, लेकिन इस दिन यह शिलाखंड इतना भारी हो जाता है कि इसे कई जोड़ी बेलों की मदद के साथ-साथ शहर के कई किसानों के द्वारा खींचे जाने पर भी यह बड़ी मुश्किलों से खींचा जाता है।

विशेष रूप से इसी दिन इस शिलाखंड के इतना भारी होने के पीछे भी एक अनोखी कहानी है। शहर में रहने वाले तमाम बुजुर्ग बताते है कि भैरूंजी के इस शिलाखंड़ को अपने स्थान से उठाए जाने से पहले काफी देर तक यहां इनके भजन-कीर्तन होते हैं और भैरूंजी के स्थान वाली सभी चढ़ाई जाने वाली शराब के समान ही श्रद्धालु इस पर भी शराब चढ़ाते हैं। यह सिलसिला काफी देर तक चलता है और ऐसा माना जाता है कि काफी शराब चढ़ाए जाने की वजह से ही भैरूंजी माने जाने वाले इस शिलाखंड का वजन बढ़ जाता है, जिसे बेलों और कई आदमियों की मदद से ही खींचा जा सकता है, इसे खेचने के लिए लगाए गए बेल भी इसे खींचते हुए भाग नहीं पाते हैं।
इसके लिए भी शहरवासियों के द्वारा एक युक्ति काम में ली जाती है, जिसमें बेलों के आसपास पटाखे फैंक जाते हैं, ताकि वे पटाखों की आवाज से डरकर भागे और भैरूंजी के इस शिलाखंड को आगे बढ़ाए। इन बुजुर्गों का कहना है कि पहले सद्भावना के साथ इस तरह पटाखे फैंके जाते थे, जिससे ये बेल डर से भागते थे और भैरूंजी का पूरे शहर में घुमाते हुए सुबह करीब तीन-चार बजे वापस अपने स्थान पर रख दिया जाता था।

'गंगा-जमुना' की होती है करोड़ों की बिक्री 
दीपावली के त्यौहार पर यूं तो कई तरह की रंग-बिरंगी आतिशबाजी वाले पटाखे बेचे जाते हैं, लेकिन यहां दीपावली से ज्यादा पटाखों की बिक्री दीपावली के दूसरे दिन घास-भैरूं की परंपरा के लिए होती है। खास बात यह है कि इस घास-भैरूं में सिर्फ एक ही पटाखे फोड़े जाते है, जिसे 'गंगा-जमुना' कहा जाता है। इस पटाखें को जलाने के बाद कुछ देर तक तो इसमें फव्वारें निकलते है, उसके बाद जोरदार आवाज के साथ ब्लास्ट होता है। घास-भैरूं के दौरान इस पटाखे को साधारण तरीके से नहीं फोड़ा जाता है, बल्कि इसे जलाकर फव्वारें निकलते हुए को भीड़ के ऊपर फैंकते हैं। यह तरीका बिल्कुल वैसे ही है, जैसे कोई बम फैंका जाता है। घास-भैरूं के दौरान विशेष रूप में 'गंगा-जमुना' का उपयोग किया जाता है, जिसके चलते इस दिन इस पटाखे की मांग में जबरदस्त उछाल आ जाता है और इसकी कीमत करीब तीन-चार गुना तक वसूली जाती है। इस लिहाज से केवल घास-भैरूं वाले दिन ही इस पटाखे की बिक्री करोड़ो रुपए का आंकड़ा पार कर जाती है।


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