देश आगे तभी बढ़ेगा जब बेटियां अपने पैरों पर खड़ी होंगी : प्रियंका चौपड़ा
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नई दिल्ली। बॉलीवुड जगत की 'मेरी-कॉम' अभिनेत्री प्रियंका चौपड़ा का मानना है कि देश आगे तभी बढ़ेगा जब इस देश की बेटियां अपने पैरों पर खड़ी हो जाएंगी। प्रियंका कहती हैं कि मैं बहुत ही आशावादी हूं और हर इनसान को आशावादी होना भी चाहिए। मेरे जीवन में हार के लिए कोई जगह नहीं है। संघर्ष करना ही मेरा एक मात्र मंत्र है और हर संघर्ष का परिणाम सुखद ही रहा है। चाहे वह रील लाइफ हो या फिर रियल लाइफ। हरदम हंसते हुए, मुस्काते हुए जीवन को जीना और फिर दूसरों के लिए कुछ कर पाने की लालसा सदा बनी रहती है।
पिछले कई सालों से यूनिसेफ के साथ मिलकर काम करते हुए मैंने अनुभव किया है कि समय लगता है लेकिन परिर्तन जरूर आता है। कभी-कभी लगता है कि यह तो पहाड़ जैसा दिख रहा है, आखिर इसे कैसे पार करेंगे तो अलगे ही पल मन के अंदर एक जज्बा पैदा होता है जब हम अपने देश की वास्तविकता के बारे में सोचते हैं तो। देश में कई समस्याएं हैं लेकिन एनीमिया की समस्या उनमें से एक सबसे बड़ी समस्या है।
जब देश की बेटियां, बेटे ही स्वस्थ नहीं होंगे तो फिर हम एक सुनहरे भविष्य की कल्पन कैसे कर सकते हैं। स्वस्थ शरीर के बिना हर तरक्की बेमानी है। आपको जानकर ताज्जुब होगी कि जब हमारे यहां 56 प्रतिशत बेटियां और 30 प्रतिशत से अधिक बेटे एनीमिया से ग्रसित हों, तब हम एक सुदृढ़ भारत की कल्पना कैसे कर सकते हैं? लेकिन एक दिन इससे हम उबरेंगे, एक दिन सवेरा होगा। देश की हर बेटी स्वस्थ होगी और हर बेटा तंदुरुस्त होगा। हम सब मिलकर लड़ेंगे।
हम सब एक होकर इसके लिखाफ बिगुल फूकेंगे। हम सब कंधे से कंधा मिलाकर कूद पड़ेंगे इस यज्ञ में। इसमें समय लगेगा, इसमें कई तरह की कठिनाइयां आएंगी, हम जानते हैं। लेकिन हमे अडिग रहना है होगा, मुट्ठी को एक साथ मजबूत करना होगा। एक-दूसरे का सहारा बनना होगा।
एक-दूसरे का पूरक बनना होगा। मैं जानती हूं इसमें समय लगेगा। लेकिन परिर्तन एक दिन जरूर आएगा, और हम लाएंगे। इसी मंत्र के साथ आगे बढ़ना होगा। जब तक हम अपनी बेटियों को स्वावालंबी नहीं बनाएंगे तब तक बात बनेगी नहीं। इसे हमें गांठ बांधना होगा। मैं भी तो एक बेटी हूं। मैंने संघर्ष किया, और सफलता पाई। बेटियां संघर्ष से ही आगे बढ़ेंगी। बेटियां स्वावलंबी बनेंगी तो देश भी आगे बढ़ेगा।
मैं इस मिशन के लिए कई जगह गई लेकिन जयपुर के पास सांगानेर के नजदीक बसे एक छोटे से गांव नानकपुरा को मैं कभी भूल नहीं सकती। बात 2013 की है, जब मैं इस मिशन के लिए सुबह जब मुंबई से चली तो मुझे पता नहीं था कि मुझे कहां जाना है। बस इतना पता था कि जयपुर के पास एक गांव में किशोर युवतियों और महिलाओं से मिलना है। सोचा, थोड़ा सा समय लगेगा फिर वापस आ जाऊंगी। लेकिन मुझे पता ही नहीं चला कि उस भीषण गर्मी में कैसे मेरे पांच घंटे बीत गए।
आपको बताउं नानकपुरा एक छोटा सा गांव हैं। यहां किशोरियों के लिए बहुत कुछ किया जा रहा था। मुझे जानने की जिज्ञासा तो थी ही साथ ही बहुत दिनों बाद गांव वालों से मिलने का मौका भी मिल रहा था। सुबह जब जयपुर में उतरी तो गर्मी के तेवर बहुत ही तीखे थे। एयरपोर्ट से होटल और फिर शायद 20 से 25 मिनट की यात्रा के बाद गांव पहुंची। इतनी गर्मी थी कि थोड़ा भी समय वहां गुजारना बहुत मुश्किल था। लेकिन गांव वालों का प्यार और किशोरियों के लिए जो काम वहां हो रहे थे, वे बहुत ही अच्छे थे। वहां गांव की महिलाओं से मिली और फिर किशोरियों से।
हर किशोरी की कहानी अलग थी। हर किशोरी का प्यार मेरे लिए अलग था। मैं ऐसी घटनाओं से अवगत हुई कि मैं आज भी हतप्रभ हूं। कैसे आज भी 21वीं सदी में हमारा समाज बेटियों को लेकर निरंकुश है। कई प्रकार की कुरितियों को लिए चल रहा है। आज भी हमारी बेटियों को अधिकार नहीं मिल रहे हैं। आज भी बेटियों को आर्थिक तंगी और रीति-रीवाजों का हवाला देकर छोटी उम्र में शादी कर दी जाती है।
कैसे कुछ बेटियां छोटी उम्र में ही विधवा हो गईं थीं। कैसे उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था। आज भी जब सोचती हूं तो मैं अंदर से परेशान और सिहर उठती हूं। उनकी कहानियां, उनकी दुःख-तकलीफ सुनते-सुनते न जाने कब पांच घंटे बीत गए। न गर्मी का होश रहा, ना खाने का और ना ही किसी और का। मैं सब कुछ भूल कर, वहीं की एक बेटी होकर रह गई थी।
यह सब बातें इसलिए याद हो आईं क्योंकि एक बार फिर से मैं उन बेटियों के हक में, उनके स्वस्थ के लिए, उनकी जिंदगी की सलामती के लिए उनके बीच जा रही हूं। मुझे उनके बीच में जाना अच्छा लगता है, उनसे बातचीत करना अच्छा लगता है। हर माता-पिता को आगे आना होगा और अपनी बेटियों को हर तरह से स्वावलंबी बनाना होगा। बस मैं केवल इतना चाहती हूं कि मैं और आप, हम सब मिलकर सरकार ने जो एनीमिया के खिलाफ जंग छेड़ रखा है, उसमें हाथ बंटाएं।
पिछले कई सालों से यूनिसेफ के साथ मिलकर काम करते हुए मैंने अनुभव किया है कि समय लगता है लेकिन परिर्तन जरूर आता है। कभी-कभी लगता है कि यह तो पहाड़ जैसा दिख रहा है, आखिर इसे कैसे पार करेंगे तो अलगे ही पल मन के अंदर एक जज्बा पैदा होता है जब हम अपने देश की वास्तविकता के बारे में सोचते हैं तो। देश में कई समस्याएं हैं लेकिन एनीमिया की समस्या उनमें से एक सबसे बड़ी समस्या है।
(वीडियो में देखें) प्रियंका ने बना दिया सैड सॉन्ग को भी सेक्सी
जब देश की बेटियां, बेटे ही स्वस्थ नहीं होंगे तो फिर हम एक सुनहरे भविष्य की कल्पन कैसे कर सकते हैं। स्वस्थ शरीर के बिना हर तरक्की बेमानी है। आपको जानकर ताज्जुब होगी कि जब हमारे यहां 56 प्रतिशत बेटियां और 30 प्रतिशत से अधिक बेटे एनीमिया से ग्रसित हों, तब हम एक सुदृढ़ भारत की कल्पना कैसे कर सकते हैं? लेकिन एक दिन इससे हम उबरेंगे, एक दिन सवेरा होगा। देश की हर बेटी स्वस्थ होगी और हर बेटा तंदुरुस्त होगा। हम सब मिलकर लड़ेंगे।
हम सब एक होकर इसके लिखाफ बिगुल फूकेंगे। हम सब कंधे से कंधा मिलाकर कूद पड़ेंगे इस यज्ञ में। इसमें समय लगेगा, इसमें कई तरह की कठिनाइयां आएंगी, हम जानते हैं। लेकिन हमे अडिग रहना है होगा, मुट्ठी को एक साथ मजबूत करना होगा। एक-दूसरे का सहारा बनना होगा।
एक-दूसरे का पूरक बनना होगा। मैं जानती हूं इसमें समय लगेगा। लेकिन परिर्तन एक दिन जरूर आएगा, और हम लाएंगे। इसी मंत्र के साथ आगे बढ़ना होगा। जब तक हम अपनी बेटियों को स्वावालंबी नहीं बनाएंगे तब तक बात बनेगी नहीं। इसे हमें गांठ बांधना होगा। मैं भी तो एक बेटी हूं। मैंने संघर्ष किया, और सफलता पाई। बेटियां संघर्ष से ही आगे बढ़ेंगी। बेटियां स्वावलंबी बनेंगी तो देश भी आगे बढ़ेगा।
मेरे लिए आसान नहीं था यह सफर
यहां तक का सफर भी आसान नहीं था। जब मैं पीछे मुड़ कर देखती हूं तो बहुत खुशी होती है। पहले मैं भी सोचती थी कि आखिर कैसे होगा? लेकिन मेरी आशावादी सोच ने मुझे आगे बढ़ने की हिम्मत दी, आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।मैं इस मिशन के लिए कई जगह गई लेकिन जयपुर के पास सांगानेर के नजदीक बसे एक छोटे से गांव नानकपुरा को मैं कभी भूल नहीं सकती। बात 2013 की है, जब मैं इस मिशन के लिए सुबह जब मुंबई से चली तो मुझे पता नहीं था कि मुझे कहां जाना है। बस इतना पता था कि जयपुर के पास एक गांव में किशोर युवतियों और महिलाओं से मिलना है। सोचा, थोड़ा सा समय लगेगा फिर वापस आ जाऊंगी। लेकिन मुझे पता ही नहीं चला कि उस भीषण गर्मी में कैसे मेरे पांच घंटे बीत गए।
आपको बताउं नानकपुरा एक छोटा सा गांव हैं। यहां किशोरियों के लिए बहुत कुछ किया जा रहा था। मुझे जानने की जिज्ञासा तो थी ही साथ ही बहुत दिनों बाद गांव वालों से मिलने का मौका भी मिल रहा था। सुबह जब जयपुर में उतरी तो गर्मी के तेवर बहुत ही तीखे थे। एयरपोर्ट से होटल और फिर शायद 20 से 25 मिनट की यात्रा के बाद गांव पहुंची। इतनी गर्मी थी कि थोड़ा भी समय वहां गुजारना बहुत मुश्किल था। लेकिन गांव वालों का प्यार और किशोरियों के लिए जो काम वहां हो रहे थे, वे बहुत ही अच्छे थे। वहां गांव की महिलाओं से मिली और फिर किशोरियों से।
हर किशोरी की कहानी अलग थी। हर किशोरी का प्यार मेरे लिए अलग था। मैं ऐसी घटनाओं से अवगत हुई कि मैं आज भी हतप्रभ हूं। कैसे आज भी 21वीं सदी में हमारा समाज बेटियों को लेकर निरंकुश है। कई प्रकार की कुरितियों को लिए चल रहा है। आज भी हमारी बेटियों को अधिकार नहीं मिल रहे हैं। आज भी बेटियों को आर्थिक तंगी और रीति-रीवाजों का हवाला देकर छोटी उम्र में शादी कर दी जाती है।
कैसे कुछ बेटियां छोटी उम्र में ही विधवा हो गईं थीं। कैसे उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था। आज भी जब सोचती हूं तो मैं अंदर से परेशान और सिहर उठती हूं। उनकी कहानियां, उनकी दुःख-तकलीफ सुनते-सुनते न जाने कब पांच घंटे बीत गए। न गर्मी का होश रहा, ना खाने का और ना ही किसी और का। मैं सब कुछ भूल कर, वहीं की एक बेटी होकर रह गई थी।
यह सब बातें इसलिए याद हो आईं क्योंकि एक बार फिर से मैं उन बेटियों के हक में, उनके स्वस्थ के लिए, उनकी जिंदगी की सलामती के लिए उनके बीच जा रही हूं। मुझे उनके बीच में जाना अच्छा लगता है, उनसे बातचीत करना अच्छा लगता है। हर माता-पिता को आगे आना होगा और अपनी बेटियों को हर तरह से स्वावलंबी बनाना होगा। बस मैं केवल इतना चाहती हूं कि मैं और आप, हम सब मिलकर सरकार ने जो एनीमिया के खिलाफ जंग छेड़ रखा है, उसमें हाथ बंटाएं।