शिक्षा के नाम पर धड़ल्ले से हो रही अवैध वसूली

जयपुर ( पवन टेलर )। प्रदेश की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के द्वारा स्कूलों की मनमानी पर लगाम कसने का प्रयास कोई खास रंग लाता दिखाई नहीं दे ...

जयपुर (पवन टेलर)। प्रदेश की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के द्वारा स्कूलों की मनमानी पर लगाम कसने का प्रयास कोई खास रंग लाता दिखाई नहीं दे रहा है। एडमिशन फीस में कमी और एकरूपता लाने के लिए एक और जहां वसुंधरा सरकार ने कवायद शुरू की, वहीं दूसरी ओर निजी स्कूलों ने सरकार के आदेश को धत्ता बताते हुए नैतिक शिक्षा के नाम पर नई किताबें और अन्य पाठयक्रम की मंहगी किताबे सिलेबस में जोड़कर अभिभावकों की जेब पर करीब एक हजार रुपए तक का अतिरिक्त भार डालना शुरू कर दिया है।

वसुंधरा राजे सरकार ने राजधानी जयपुर में निज़ी स्कूलों की मनमानी पर जहां अंकुश लगाने की बात कही थी, वहीं अब निजी स्कूलों की इस मनमानी का शिकार इन स्कूलों में  वाले बच्चों के अभिभावक हो रहे हैं। इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के सिलेबस में जो किताबें जोड़ी गई है, उनका सरकार की ओर से तय किए गए सिलेबस से कोई लेना-देना नहीं है।

इन स्कूलों में एक और जहां अच्छी एज्युकेशन देने के नाम पर नैतिक शिक्षा की तीन-चार किताबें अतिरिक्त पढ़ाई जा रही है, जिनमें एक किताब के 200 रुपए तक की राशि ली जा रही है, वहीं स्टेंडर्ड मैंटेन करने के नाम पर भी बेल्ट, मोजे और टाई जैसी छोटी-छोटी चीजें भी दी जा रही है, जिसके लिए अभिभावकों से 100 रूपए से लेकर 500 रूपए तक लिए जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त बच्चों की एक्टीविटी फाइल बनाने के नाम से अतिरिक्त शुल्क लिया जा रहा है, जो 500 से लेकर 1000 रुपए तक है।

मजे की बात तो यह है कि सरकारी स्कूलों में जहां निजी स्कूलों से ज्यादा पढ़े-लिखे और समझदार शिक्षक है, वहीं इसके बाद भी सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर उससे कई गुणा गिरा हुआ माना जाने लगा है, जिसकी वजह से ही इन निजी में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या में दिन-ब-दिन इजाफा होता जा रहा है। लोगों की इसी बदलती हुई मानसिकता का फायदा ये निजी स्कूल उठा रहे हैं और मनमाने नियम व शुल्कों के कारण अभिभावकों को बजट बिगाड़ दिया है।

शहर के कई नामी निजी स्कूलों में बच्चों पर किए जाने वाला मासिक खर्च कम से कम 1500-2000 तक बैठ जाता है, वहीं इन स्कूलों में हर एक से दो माह के भीतर सोशल इक्टीविटी के नाम पर वसूले जाने वाले शुल्क 500 से 1000 रुपए से अभिभावक परेशान है। इन स्कूलों की नकल वे सभी छोटे स्कूल भी कर रहे है, जहां बच्चों की मासिक स्कूल फीस कम होने के साथ पढ़ाई का स्तर भी अच्छा था, लेकिन राजधानी में शिक्षा देने वाले स्कूल अब कमाई देने वाली दूकान से समान या फिर लूटखोरी का अड्डा बनते जा रहे हैं।


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