आतंक के साये में बिना स्टेशन के भी रूकती थी ट्रेनें

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जयपुर। बीते दौर में डाकुओं द्वारा बीहड़ों में अंजाम दी जाने वाली वारदातों के चलते कभी उनके इलाकों में उनके आतंक का ऐसा माहौल हुआ करता था कि वहां आने वाली ट्रेने भी स्टेशन नहीं होने के बावजूद रुक जाया करती थी। लेकिन अब बदलते वक्त के साथ ही अधिकांश डाकुओं ने समर्पण कर न सिर्फ सही रास्ता अपनाया है बल्कि कई डाकू आज सामाजिक सरोकार के कार्यों में भी लगे हैं।

इसी प्रकार के कार्यों के बीच श्री कल्पतरु संस्थान की अनूठी पहल दस्यु जीवन पर आधारित पर्यावरण को समर्पित पूर्व दस्युओं का महाकुम्भ ''पहले बसाया बीहड़ - अब बचाएंगे बीहड़'' कार्यक्रम बीस मार्च को दोपहर 2 बजे इंदिरा गांधी पंचायतीराज संस्थान ऑडिटोरियम में होनें जा रहा है। कार्यक्रम संयोजक विष्णु लाम्बा इन दिनों सात राज्यों के सताईस पूर्व दस्युओं को न्यौता देनें में जुटें है। इसी सिलसिले में वे पूर्व कुंख्यात् डकैत पंचम सिंह को न्यौता देनें जमुना किनारे पहुंचे, जहाँ डाकू से साधू बनें पंचम सिंह रहते है।

इस अनूठे समारोह से बेहद खुश पंचम सिंह नें कहा कि जयप्रकाश नारायण के प्रयासों से हम साढ़े पांच सौ डाकुओं नें समर्पण तो कर दिया, लेकिन आज तक कोई भी हमें सामाजिक कार्यों से जोड़नें नहीं आया। 94 साल के पंचम आज भी अपने हौसलों की वजह से युवा की तरह लगते है। अपने जीवन के अनुभव ताजा करते हुए पंचम सिंह नें कहा मैंने चौदह साल जंगलों में बिताए हैं। 94 साल की उम्र में मैंने राज सत्ता, डाकू सत्ता और धर्म सत्ता भी देखी है।

उन्होंने कहा कि डाकुओं को लेकर फिल्मों में सब झूठ दिखाया गया है। असल में डाकुओं का भी नियम क़ानून संविधान होता है। डाकुओं में एकता होती थी, जो आज राज सत्ता और धर्म सत्ता में नहीं है। हम 550 डाकुओं ने एकता के दम पर भारत सरकार को हिला दिया था। हमारे गिरोह का सफाया करने के लिए सरकार ने एक करोड़ का इनाम रखा था। तब सौ रूपए में एक तोला सोना आता था। डाकू चरित्रवान होते थे। हमने जीवन में किसी माँ-बहन को बुरी निगाह से भी नहीं देखा।

पंचम सिंह नें कहा कि एक बार मैंने एक बलात्कारी को पेड़ से बाँध कर ज़िंदा जला दिया था। हमने अमीरों से लेकर गरीबों को दिया है। इतिहास गवाह है कि आज तक किसी डाकू ने अपने लिए कोई कोठी नहीं बनाई। गाड़ियों की कोई कमी नहीं थी। पैंतालीस जिलों में हमारा ही बोलबाला था। आतंक ऐसा था कि स्टेशन नहीं होने पर भी ट्रेन रूक जाया करती थी। हम पूजा-पाठ खूब करते थे। कोई भी बाल-बच्चों को छोड़ना नहीं चाहता, लेकिन परिस्थिति इंसान को ऐसे नाचती है, जैसे बन्दर को मदारी नाचता है।

मैंने यह भी अनुभव किया है कि परिस्थतियां इंसान को कुछ सिखाने के लिए आती है। मैं चौथी कक्षा तक पढ़ा हूँ और चौदह साल की उम्र में मेरी शादी हो गई थी। गाँव में हुए झगड़े के बाद बदले की भावना को लेकर में चम्बल घाटी में डाकुओं से जा मिला और एक दिन गांव में आकर छह लोगों को परम धाम पंहुचा दिया और डाकू बन गया। डाकू जीवन में हमें स्कूल बनवाये हजारों कन्याओं की शादी करवाई। एक करोड़ का हमारा परिवार था, जंगल के आदिवासी हमारे साथ थे। जो स्कूल हमने चम्बल घाटी में खोला था, उसमे 17 मास्टर रखे थे और 500 विद्यार्थी पढ़ते थे।

उन्होंने कहा कि मेरे स्कूल का रिकार्ड रहा कि पांच साल में कोई भी लड़का फ़ैल नहीं हुआ। मास्टर हो चाहे पढ़ने वाला कोई लड़का, अगर समय पर स्कूल नहीं आते तो 24 घंटा बंद कर देते थे। हम जंगल में रहते थे, जंगल के वातावरण में कोई भी डाकू कभी बीमार नहीं हुआ। कभी किसी डाकू को जानवर ने नहीं सताया। हेलीकॉप्टर द्वारा बंगलादेश से अच्छे हथियार आते थे।

पंचम सिंह ने कहा कि परमात्मा का कमाल तो यह है कि गोलियों से बचाया, फांसी से बचाया और साधू बना दिया। अब जयपुर में होने जा रहे महाकुम्भ में आकर जीवन के आखिरी दिनों में उस पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लेंगे, जिसने हमें माँ की तरह रखा।

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