'पांच साल तक वार्ड में विकास के लिए तरसे लोग'

जयपुर। शहरी निकायों में बेशक 50 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण देने की वकालत की जाती  रही हो, लेकिन पार्टियों के पास शिक्षित महिलाओं के चेहरे ...

जयपुर। शहरी निकायों में बेशक 50 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण देने की वकालत की जाती  रही हो, लेकिन पार्टियों के पास शिक्षित महिलाओं के चेहरे नहीं है। कांग्रेस-भाजपा दोनो पार्टियां इस बात को स्वीकार करती है। यह हाल उन वार्डों का भी है, जहां रिजर्व सीट होने के कारण ऐसे प्रत्याशी नहीं मिलते है जिनका राजनीति से गहरा नाता होता है।

ऐसे इन नेताओं के चुनकर आने पर पांच साल क्षेत्र की जनता को मुसीबतों को सामना करना पड़ता है। पार्षद के सक्रिय नहीं रहने के कारण वार्डों में समस्याओं का अंबार लग गया। ऐसे ही कुछ वार्डों का हाल जानने की कोशिश की तो सामने आया है कि पांच साल में आम जनता को गलियों से कचरा उठाने के लिए अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़े। घरेलू कामों में व्यस्त रहने वाली महिला पार्षदों ने क्षेत्र की समस्याओं से बेरूखी रखी।

भाजपा प्रवक्ता कैलाश भट्ट का तो साफ कहना है कि कई सीटों में तो महिला उम्मीदवार नहीं मिलते है, ऐसे में नेताओं की पत्नियों को टिकट देने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं होता है यही हाल कांग्रेस में भी है जहां नेता अपनी पत्नियों को टिकट दो दिला लाते है लेकिन उनका राजनीतिक अनुभव कम होने के कारण क्षेत्र की समस्याओं को साधारण सभा में उठा तक नहीं पाती है ऐसे में क्षेत्र के प्रतिनिधित्व नहीं मिलने का खामियाजा पांच साल तक क्षेत्र की जनता को भुगतना पड़ता है।

पांच साल यह सुनती रहती जनता

मैडम खाना बना रही है, अभी बात कराता हूं, यदि कोई काम हो तो मुझे बताईए, मैडम सत्संग में है। कुछ काम हो तो मुझसे कहिए, मैडम घर में है, मोबाइल मेरे पास है। जी, मैं मैडम के घर से बोल रहा हुं, पर बात नहीं करा सकता हुं आप जो काम हो मुझसे कहिए। मैडम, नहीं निगम का काम हो तो मुझसे बात कीजिए। शहर में पांच साल में लगभग एक दर्जन से ज्यादा वार्डों में महिला पार्षद की बजाए उनके पत्तियों की सक्रियता के कारण लोगों को यही जुमले सुनने को मिले। वार्डों में विकास कार्य करवाने के लिए उनके पत्तियों, रिश्तदारों और संग संबंधियों के जनता चक्कर लगाती रही है। वहींजनता ने महिला पार्षद के दर्शन वार्ड में कभी-कभार किए ऐसे में अब जनता  के मन में सवाल उठ रहा है कि नेताओं की पत्नियों को टिकट देने में पार्टिया आगे रहती है ऐसे में उनकी योग्यता क्यो नहीं जांची जाती है इस वजह से ऐसे पार्षदों के जीत के आने से पांच साल आम जनता को परेशानियोंका सामना करना पड़ता है।

इन वार्डों में पति रहे ज्यादा सक्रिय

दुर्गेश नंदिनी, वार्ड 7 (भाजपा), नीता यादव वार्ड 11 (भाजपा), संतोष जागिड़ (वार्ड 12) भाजपा, अंजू चौधरी (वार्ड 15) भाजपा, संतोष मीणा, कांग्रेस (वार्ड 19), ममता शर्मा वार्ड 22 (भाजपा), गीता राजोरिया वार्ड 23 (भाजपा), किरण गुप्ता (वार्ड 25), कांता छीपा (वार्ड 30), संतोर्ष शर्मा वार्ड 32 (कांग्रेस), संतरा देवी ,वार्ड 48 (कांग्रेस) सहित गीता यादव, संतरा देवी, मंजरी ओझा, मोहिनी मिश्रा, कमला बैरवा सहित कई महिला पार्षदों यहां पत्ति ज्यादा सक्रिय रहे।

"समस्या यह है कि जब महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण हुआ तब अचानक इतनी संख्या में महिलाओं को मिलना संभव नहीं था। ऐसे में नेताओं की पत्नियों को टिकट देना मजबूरी बना अब महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता आई। इस बार टिकट शिक्षित महिलाओं को देने की प्राथमिकता रखी जाएगी।"    - कैलाश नाथ भट्ट, प्रदेश प्रवक्ता, भाजपा


"पढ़ी-लिखी महिलाओं को महत्व मिलना चाहिए। आज संचार क्रांति का समय है। कांग्रेस प्रयास करेंगी कि उन महिला पार्षदों को रिपीट नहीं किया जाए, जिनके पत्ति सक्रिय रहे है और ऐसी शिकायत आम जनता को रही है। हमारे सामने मोहिनी कंवर बुटाटी, सुनीता मावर का अच्छा उदाहरण है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी अच्छी शैक्षणिक महिलाओं को प्राथमिकता देंगी।"              - अर्चना शर्मा, प्रवक्ता प्रदेश कांग्रेस कमेटी



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